त्रिपुरा में गुंडो की अराजकता का कुशासन खत्म होते ही देशद्रोही माफिया कम्युनिस्ट के कार्यालयों पर जनता का गुस्सा निकलना परसों से चालू है, जो कल तक नंगी तलवारें ले कर सड़क पर घूमते थे, लोगों को भरे चौराहे पर मौत के घाट उतारते थे, सरेआम बलात्कार करते थे, आज उनकी जान के लाले पड़े हैं, कल के गुंडे माफिया कम्युनिस्ट आज अंडरग्राउंड हो चुके हैं, छुपते फिर रहे हैं, कल ऐसे ही एक बड़े भारी दादा भाई को जनता ने पकड़ लिया, अपने आपको डॉन समझने वाला कम्युनिस्ट टुच्चा कल बुरखा पहन कर औरत बन कर भागने का प्रयास कर रहा था, जनता ने धर दबोचा और जम कर पूजा कर दी, मुझे तो चाइना गेट फ़िल्म के जगीरा की याद आ गयी, कमोवेश पूरे त्रिपुरा में यही हाल है, जनता चुन चुन कर चीन परस्त देशद्रोही कम्युनिस्ट गुंडों की धुलाई कर रही है, इस सब के बीच कल ही त्रिपुरा में मार्क्स लेनिन (एक विदेशी व्यक्ति जिसकी की मूर्ति भारत मे लगाने का कोई औचित्य ही नही था) की मूर्ति को जनता ने बुलडोज़र मंगवा कर उखाड़ फेंका, ये शुरुआत है त्रिपुरा में राष्ट्रवाद की और विदेशी पार्टी यानी कम्युनिस्ट पार्टी (देशद्रोही पढ़ा जाए) के अंत की, इस से सबसे ज़्यादा चिंता चीन को हो रही है क्योंकि अब दाल नही गलने वाली, भारत के लिये यह सबसे सुखद खबर है, पूर्वोत्तर सीमा अब सुरक्षित हो रही है, देशद्रोहियों का खात्मा हो रहा है, जनता जाग रही है ।
त्रिपुरा में गुंडो की अराजकता का कुशासन खत्म होते
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