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न अधिकारी सुनते थे न पार्षद न नेतागण, सभी परेशान थे.

by admin

हमारे मोहल्ले में एक पहलवान रहा करते थे, ऊंचे कद काठी के और हुष्ट पुष्ट, मौहल्ले में कई समस्याएं थी, न अधिकारी सुनते थे न पार्षद न नेतागण, सभी परेशान थे….

मौहल्ले की मीटिंग बुलाई गई, समस्याओं पर चर्चा हुई, तभी पहलवान उठ खड़े हुए, बोले देखो अधिकारियों, नेताओं के घर के आस पास गंदगी है? नही है, उनके यहाँ पानी की समस्या है? नही है, उनके यहाँ सीवर की समस्या है? नही है, किसी के यहाँ कोई समस्या नही है जबकि ये हमारे पैसें पर पलते हैं इन्हे हमारे पैसों से तनख्वाह मिलती है, हमारे मौहल्ले के आवंटित पैसों से ये काली कमाई करते हैं, ये ऐसे नही मानेंगे इनकी धुनाई करो तभी ये मानेंगे, पहलवान जी का भाषण ज़बरदस्त था सब का ब्रेनवाश हो गया और सब कानून अपने हाँथ में लेने को तैयार हो गए, पर समस्या थी कि शुरुआत कौन करेगा? सो पहलवान जी ने कहा तुम सब पीछे रहना मैं निपट लूंगा..

जब नगर निगम का कर्मचारी आया तो पहलवान जी उस पर पिल पड़े, उसकी जम कर धुनाई कर दी, बात आग की तरह फैल गयी, अधिकारियों में खौफ बैठ गया, डर के मारे अधिकारियों ने तुरंत काम करवा दिया, मौहल्ले वाले खुश, आनन फानन में मौहल्ला मीटिंग बुलाई गई और पहलवान जी को अध्यक्ष बना दिया गया …

पहलवान जी ने अध्यक्ष बनते ही अपना रौब और रुतबा अधिकारियों और नेताओं पर गाँठना शुरू कर दिया, जो बात ना माने उसकी धर के धुलाई कर देते, अब तो पहलवान जी का सिक्का चलने लगा, सभी डरने लगे पहलवान जी से, उधर पहलवान जी ने अपना रौब मौहल्ले पर भी दिखाना शुरू कर दिया, कुछ समय बाद वही अधिकारी और नेताओं ने पहलवान से दोस्ती कर ली, अब समस्या जस की तस थी, क्योंकि नेता और अधिकारी काली कमाई का कट पहलवान को पहुचाने लगे थे, जिस काली कमाई के विरोध में कल तक पहलवान जी थे आज वही काली कमाई और मलाई पहलवान जी को भा रही थी और मौहल्लेवासी परेशान थे…

सब ने सोचा कि पहलवान को बदल देना चाहिए सो अगले चुनाव में उनके खिलाफ प्रत्याशी खड़ा किया गया, लेकिन अब तक पहलवान बहुत ताकतवर हो चुका था, सो उसने प्रत्याशी की जम लर धुनाई कर दी हाँथ पाँव तोड़ दिए, नेताओं और अधिकारियों से सांठ गांठ कर के चुनाव जीत लिया, अब पहलवान फिर सत्ता पर काबिज था, अब हालात बाद से बदतर हो गए, जो कोई पहलवान से शिकायत करने जाए पहलवान उसे ही कुट देता था, पहलवान ने मौहल्ले को अपनी निजी संपत्ति की तरह इस्तेमाल करना शुरू कर दिया था, और अपने बाप की एक मूर्ति चौराहे पर लगवा दी, बात सबको खटक रही थी पर कोई बोलने की हिम्मत नही जुटा पा रहा था…

इधर एक बार फिर चुनाव होना था, इस बार जिसकी हड्डी पसली तोड़ी गयी थी वो फिर से मैदान में उतर गया, चुप चाप सब से समर्थन मांग कर चुनाव लड़ा, नतीजे आए तो सब हैरान थे, पहलवान हार गया और नया लड़का जीत गया, भ्रष्ट नेता और अधिकारियों की हवा निकल गयी पर उन्होंने तुरंत पाला बदल लिया, अब पहलवान अकेला पड़ गया, मौहल्ले वासियों ने सबसे पहले पहलवान के बाप की मूर्ति उखाड़ फेंकी, पहलवान ने एक एक कर के सभी को कभी न कभी पीटा था, सो सब एक हो कर पहलवान के घर जा धमके, पहलवान समझ चुके थे अगर जनता के हाँथ चढ़ गया तो उसका कीमा बन जायेगा, सो बुरखा पहन कर भाग निकला, उधर पहलवान के नाजायज़ बच्चे धरना दे रहे हैं कि पहलवान के साथ गलत हो रहा है ।

त्रिपुरा की भी एकदम ऐसी ही कहानी है, लोगों को बरगला कर कम्युनिस्ट ने सरकार बनाई, फिर जम कर दादागिरी की, जो शिकायत करे या सरकार के विरुद्ध जाए उसे मरवा दिया गया महिलाओं के साथ गैंगरेप किये गए, जनता भरी बैठी थी की अचानक उसकी नज़र नए लड़के विप्लव देव पर पड़ी, जिस पार्टी को पिछली बार 1.3% वोट मिले थे उसे जनता ने 50% से अधिक वोट दे कर जीता दिया, कम्युनिस्ट राज्य को अपनी निजी संपत्ति समझ रहे थे जनता ने कम्युनिस्ट के बाप लेनिन की मूर्ति उखाड़ फेंकी, अब कम्युनिस्टों की नाजायज़ औलादें छाती पीट रहीं हैं कि त्रिपुरा में गलत हो रहा है, गलत तो तब हो रहा था जब हत्यायें हो रही थीं, गलत तो तब हो रहा था जब महिलाओं के साथ गैंगरेप हो रहे थे, आज तो सिर्फ मूर्ति उखड़ी गयी है लेकिन झूठा प्रोपोगंडा फैलाया जा रहा है कि वहाँ हालात खराब हैं, जबकि एक भी व्यक्ति का ना तो हाँथ टूटा न पैर, जबकि कम्युनिस्ट होते तो अब तक सैंकड़ो लोगों के हाँथ पाँव काट दिए गए होते ।

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